मन की दो बातें
पीड़ा ,चुभन ,
एक जतन
दर्द हर ले
प्रण कर ले
आँसूं पोंछ
ख़ुशी दबोच
हंसी फैला
बहा रैला
हो जा मगन
पीड़ा चुभन .........
निर्मल नदी की तह में ,
गोल गोल से कुछ पत्थर
अब नहीं रहे नुकीले ,
वक़्त की धारा में बहते
बदल लिए हैं उन्होंने अपने मिजाज
समझ गए की चुभन देने से
कुछ नहीं हासिल
हाँ सहारा देने से
गर्व होता है अपने होने पर
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