गज़ल
दिल ने पूछा क्या है जीवन
ज़हन ये बोला उलझन-उलझन
पहले दिल में आईं दरारें
उसके बाद बंटा घर आँगन
साथ मेरे छप्पर रोता है
जब-जब आता है ये सावन
जीने का सामान जुटाते
भूल गया जीवन की थिरकन
कंचे, गिल्ली, गेंद, पतंगें
याद बहुत आता है बचपन
दाग दिखाते हैं चहरे के
दूर हटा दो सारे दर्पन
अंगारों से यारी करके
जल कर खाक हुआ है दामन
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