गज़ल
ज्वालामुखी तो चुप है , लावा उबल रहा है.
ऊपर है राख अंदर,अंगार जल रहा है.
अब और इसको छेड़ा , बन जायेगा ये शोला .
जो दर्द आदमी के सीने पल रहा है.
पड़ने से किरकिरी के आंसू निकल पड़े थे .
मैं ये समझ रहा था , पत्थर पिघल रहा है.
जर्रे की कोशिशों को जी भर के दाद दीजे.
वो आसमान छूने कितना , उछल रहा है .
वैसे तो क़द ‘अनिल’ का, कुछ कम नहीं है उस पर,
कुछ बोझ है ज़ियादा, झुक कर वो चल रहा है.
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