"बारिश की बूँदें"
ये बारिश की बूँदें
क्यों अपनी सी लगती हैं?
कुछ अनछुए पल से
मिलती सी लगती हैं
ये बारिश की बूँदें---
जब तुमसे पहली बार मिली
तो भी पहली बारिश थी
आज मैं तुमसे दूर सही
ये वो भी पहली बारिश हैं--
हाथों को ले के हाथों में
जो तुमने कसमें खाई थी
वो भी बारिश की बूँदें थी
छन छन के बहने पाई थी--
हर ख़त पढ़ के जो मोती गिरे
वो भी बारिश की बूँदें थी
जो तड़प थी तुमसे मिलने की
वो बूँदें आँखों से आई थी--
ये बूँदें अब न वैसी हैं
जैसी थी सोलह साल में
भीगू कब किस बारिश में
चुभती हैं अब ये सांस में--
जो मैं तुसे कभी मिलूं
वो भी मौसम में बारिश के
जो उस बारिश में पाया मिल के
न इस बारिश में पाओगे!!
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