हर शाम देखता हु ,उस नदी का किनारा ,
हकीकत में जो ना दिखे मुझे ,
तो लिया तेरी आँखों का सहारा
किन्नारे बहते हुए कुछ फूल ,
में महसूस मैं करू तुझको .
नंगे पैर सहते हुए सब शूल ,
सहूँ और तलाश में झोंक दूँ खुदको ,
तलाश उस मणिचिका की ,
जो पियासे को दे पियास का कारण,
तलाश उस जलती चिता की ,
खत्म कर अंतिम पग इन्सां के,
नई सुरुआत का जो करे वरण,
तलाश उस हरी भरी आँखों की,
सब खुशियाँ ही ना देखी हों .
कुछ दुनिया भी देखी हो जिसने ,
ये दुनिया है ,खुशियों के दिन हैं अनेक ,
पर रात घनेरी गम की भी तो हैं किस्मे ,
माना की कठिन हैं रांहें ,कठिन है मंजिल,
दूर बहुत है फासला ,
पर मन की आवाज ,जो गुंजो तुम,
बढ़ जाए मीलों तक हौसला
इक दिन वो मिलन होगा जरूर जब
तुम भी वहीँ ,वो नदी का किनारा जहाँ
और हकीकत भी वहीँ खड़ी होगी ,
तुम खुद से उनको झांक रहे होगे ,
वही इस कठिन तलाश की अंतिम और सरल कड़ी होगी ,
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